Monday, 8 December 2025

19/2025

 नागफनी आँचल में बान्ध सको तो आना / किशन सरोज


नागफनी आँचल में बाँध सको तो आना

धागों बिन्धे गुलाब हमारे पास नहीं।


हम तो ठहरे निपट अभागे

आधे सोए, आधे जागे

थोड़े सुख के लिए उम्र भर

गाते फिरे भीड़ के आगे


कहाँ-कहाँ हम कितनी बार हुए अपमानित

इसका सही हिसाब हमारे पास नहीं।


हमने व्यथा अनमनी बेची

तन की ज्योति कंचनी बेची

कुछ न बचा तो अँधियारों को

मिट्टी मोल चान्दनी बेची


गीत रचे जो हमने, उन्हें याद रखना तुम

रत्नों मढ़ी किताब हमारे पास नहीं।


झिलमिल करती मधुशालाएँ

दिन ढलते ही हमें रिझाएँ

घड़ी-घड़ी, हर घूँट-घूँट हम

जी-जी जाएँ, मर-मर जाएँ


पी कर जिसको चित्र तुम्हारा धुँधला जाए

इतनी कड़ी शराब हमारे पास नहीं।


आखर-आखर दीपक बाले

खोले हमने मन के ताले

तुम बिन हमें न भाए पल भर

अभिनन्दन के शाल-दुशाले


अबके बिछुड़े कहाँ मिलेंगे, यह मत पूछो

कोई अभी जवाब हमारे पास नहीं।


-किशन सरोज

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